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Pushyamitra Shunga / पुष्यमित्र शुंग कौन थे ?

भारत भूमि को वीरों ने अपने रक्त से सींचा हे तभी तो ये भूमि सोने की चिड़िया बनी ।

महान गुरु चाणक्य ने अपने परम शिष्य चंद्रगुप्त को मगध साम्राज्य का राजा बनाकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। आगे चलके इसी मौर्य साम्राज्य ने गुरु चाणक्य के अखंड भारत के सपने को पूरा किया । मौर्य शासकों के काल में भारत अपनी बुलंदियों पर पहुंचा और अपनी सीमाओं का विस्तार किया । इनके बाद से होते हुए ये सत्ता सम्राट अशोक के हाथो मे आई अशोक बहुत ही वीर पराक्रमी योद्धा सिद्ध हुए। इनकी वीरता और गुरु चाणक्य की शिक्षाओं की बदौलत भारत का व्यापार, धर्म, दर्शन पूरे विश्व में पहुंचा। पर इतने कुशल और पराक्रमी योद्धा सम्राट अशोक ने कलिंग के उस महा विनाशक युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपना लिया और शांति के मार्ग पर बौद्ध धर्म के प्रचार पर बढ़ने लगे। पर शांति से शासन को मजबूती नही दी जा सकती। सम्राट अशोक ओर उसके बाद के शासकों के बौद्ध धर्म प्रचार से लोगभारतीय धर्म को छोड़ने लगे। लोग राजाओं के डर से बौद्ध धर्म अपनाने लगे। भारत की हजारों सालों से चली आ रही वैदिक व्यवस्था अपने ही देश से मिटने लगी। भारत के अधिकांस राज्य बौद्ध प्रचारकों पर अधिक से अधिक धन खर्च करने लगे। वहीं उस समय का मौर्य साम्राज्य सनातन धर्म से दूर होने के कारण कई टुकड़ों में टूट गया। अब क्षत्रिय राजा सनातन धर्म को त्याग कर बौद्ध के शांति के मार्ग को अपनाने लगे। राजा का कर्तव्य होता हे बलपूर्वक अपने राज्य ओर प्रजा की रक्षा करना परंतु अब अधिकांस राजा तलवार को त्यागकर बौद्ध भिक्षु बनके बौद्ध धर्म का प्रचार करने लगे। भगवान बौद्ध के शांति के संदेशों को दूर दूर तक पहुंचाने के लिए राजाओं ने राजकोष से धन खर्च करना शुरू कर दिया। ये कुछ हद तक सही भी था की भारत का धर्म अब पूरे विश्व पर छाएगा, पर राष्ट्र के तौर पर देखें तो सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कदम सिद्ध हुआ। कमजोर हो चुके मगध साम्राज्य के तत्कालीन सम्राट ब्रहद्रथ की बौद्ध के शांति की राहों पर चलने के चलते विदेशी यवन (यूनानी) राजा डेमेट्रियस प्रथम जिसका राज बाकट्रिया पर था उसने मौका पाकर सिंध पर हमले करने शुरू कर दिए । इन भयंकर हमलों का जवाब देना बौद्ध शासकों को भरी पड़ रहा था। मौर्य साम्राज्य चारो तरफ से शत्रुओं से घिर चुका था। विदेशी यवनों की नजर भारत की अपार दौलत पर थी। जिससे बचाने के लिए भारत को कुशल नेतृत्व की जरूरत महसूस होने लगी। और एक ऐसे वीर योद्धा की जो राज्य की रक्षा कर सके और पुनः वैदिक धर्म की स्थापना करे, वैदिक मूल्यों पर चले जो शांति के मार्ग को छोड़ तलवार को स्वीकारते हुए राज्य के शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध का शंखनाद करे। ऐसे योद्धा की जो अपने देश, धर्म और समाज को रक्षा कर सके। ओर इसी के साथ एक वीर बाहुबली योद्धा का जन्म हुआ जिसने शांति से पहले तलवार को चुना। वैदिक धर्म के पतन को देख उसकी रगो मे रक़्त उबाल मार रहा था। मगध साम्राज्य को उखाड़ फेंकने वाले इस योद्धा का नाम था पुष्यमित्र शुंग ।

कौन थे पुष्मित्र शुंग ?

पुष्यमित्र शुंग का जन्म ईशा के जन्म से 184 वर्ष पहले हुआ था। उस समय मगध साम्राज्य पर सम्राट ब्रहद्रथ का शासन था। सम्राट ब्रहद्रथ बौद्ध धर्म का पालन करते थे और मात्रा शांति चाहते थे। राष्ट्र के प्रति प्रेम, निष्ठा और समर्पण के भाव से पुष्मित्रा शुंग मगध की सेना में भर्ती हुए ओर कुछ ही समय में अपनी वीरता और कुशलता से सेनापति को उपाधि हासिल की। अब मगध साम्राज्य के पास एक कुशल और महावीर सेनापति था जो सच में मगध साम्राज्य का सबसे अनमोल धन था। उधर सिंध में विदेशी ग्रीक राजा डिमेट्रियस ने सिंध के स्थानीय बौद्ध भिक्षुओं को अपने में मिला लिया। उसने बौद्ध भिक्षुओं को अपनी बातों ने उलझाकर कहा यदि तुमने युद्ध में हमारा साथ दिया तो सारे यवन (यूनानी) बौद्ध धर्म अपना लेंगे। डिमेट्रियस के सैनिक बौद्ध भिक्षुओं के भेष में छुपकर ब्रहद्रथ की सेना की तैयारियों को देखने लगे, ओर जासूसी करने लगे वे महत्वपूर्ण जानकारियां डिमेट्रियस तक पहुंचाने लगे, बौद्ध भिक्षुओं का भेष होने से उनपर कोई संदेह नहीं कर सकता था। इस षड्यंत्र में यवनों द्वारा स्थानीय बौद्ध भिक्षुओं को दिए झूठे वचन के चलते बौद्ध भिक्षुओं ने भी सहयोग किया। ओर बहुत से बौद्ध भिक्षु राष्ट्रद्रोही बन गए। अब डिमेट्रियस द्वारा भारत विजय की तैयारियां शुरू हो गई। बौद्ध भिक्षु यवन (यूनानी) सैनिकों को बौद्ध भिक्षुओं के भेष में अपने मठों में पनाह देने लगे, ये यवन बहरूपिए बौद्ध मठों में हथियारों को छुपाने लगे। इस षड्यंत्र के समाचार गुप्तचरों के द्वारा सम्राट ब्रहद्रथ तक भी पहुंचे पर अपने बौद्ध प्रेम के चलते उन्होंने इस संकट को गंभीरता से नहीं लिया। वहीं सेनापति पुष्यमित्र शुंग को जब इस षड्यंत्र की सूचना मिली तो वे स्वयं राजा के पास जाकर बोले– हे राजा आप आज्ञा दें हम इन विदेशी यवन बहारूपियों ओर इनका सहयोग करने वाले देशद्रोही भिक्षुओं को मिट्टी में मिला देंगे। आज्ञा दें जिसने भी मगध साम्राज्य से विश्वासघात किया उसकी नस्लें मिटा दी जायेगी। – परंतु अपने बौद्ध प्रेम के चलते ब्रहद्रत ने सेनापति पुष्यमित्र शुंग से किसी भी प्रकार की बौद्ध भिक्षुओं के विरुद्ध कार्यवाही करने से मना कर दिया। सम्राट ब्रहद्रथ की प्रतिक्रिया देख कर सेनापति पुष्यमित्र शुंग समझ गए की सम्राट ब्रहद्रथ में वो सामर्थ्य नहीं हे। वे अपने बौद्ध धर्म को राष्ट्र की सुरक्षा से ऊपर मानते हैं। उनके लिए मगध पर चाहे जितना बड़ा संकट आ जाए, राष्ट्र को कितनी भी हानि हो उन्हे इस बात की कोई चिंता न थी। परंतु राज्य के बौद्ध भिक्षुओं पर संदेह के आधार पर कार्यवाही उनके लिए चिंता का विषय थी मानो ये उनकी दृष्टि में घोर पाप हो ओर देशद्रोह जितना अपराध हो। सेनापति पुष्यमित्र शुंग क्रोध करते हुए सम्राट ब्रहद्रथ से बोले – मगध की सेना मगध के सेनापति के साथ हे किसी सम्राट के नही राज्य की सुरक्षा के लिए में बौद्ध शिविरों में छुपे विदेशी यवनों पर हमला अवश्य करूंगा । चाहे मुझे सम्राट के विपरीत ही क्यूं न जाना पड़े।– सम्राट के आदेश के विरुद्ध पुष्यमित्र शुंग ने सेना तैयार की और निकल पड़े सिंध की तरफ। सिंध के बौद्ध शिविरों पर ये पुष्यमित्र शुंग का पहला हमला था जो अत्यंत क्रूर सिद्ध हुआ। भिक्षुओं के भेष में छुपे 300 से अधिक यवन सैनिकों को जंजीरों से जकड़कर जब पुष्यमित्र शुंग के सामने लाया गया तो शुंग के आदेश अनुसार इन सभी यवन सैनिकों की गर्दने काट दी गई। और सभी देशद्रोही बौद्ध भिक्षुओं को बंदी बनाकर मगध के सम्राट के समक्ष लगा गया। सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने सम्राट ब्रहद्रथ को तलवार सौंपते हुए कहा की – हे सम्राट अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करें ओर इन राष्ट्रद्रोहीयों को समाप्त करें। – परंतु सम्राट ब्रहद्रथ ने सेनापति शुंग द्वारा उनके आदेश के विरुद्ध जाने के कारण सेनापति पुष्यमित्र शुंग को अपनी सभा से निष्कासित कर दिया। पुष्यमित्र शुंग को सम्राट के राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति इस लापरवाही की अपेक्षा न थी। यहीं से पुष्यमित्र शुंग की क्रोध की ज्वाला फूट पड़ी।

एक दिन ब्रहद्रथ अपनी सभा में थे तभी वहां पर पुष्यमित्र शुंग अपने बाघी सैनिकों के साथ पहुंच गए। ओर दोनो के बीच भरी बहस छिड़ गई। विवाद इतना बढ़ गया की सम्राट ब्रहद्रथ ने पुष्यमित्र शुंग पर हमला कर दिया। इसी के उत्तर में पुष्यमित्र शुंग ने अपनी तलवार से एक ही बार में ब्रहद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया। मगध के सम्राट ब्रहद्रथ के वध के बाद पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को मगध का सम्राट घोषित कर दिया और शुंगवंश की स्थापना की ।

पुष्यमित्र शुंग ने सर्वप्रथम सभी राजाओं को संगठित किया ओर संगठित सेना को लेकर पश्चिम की ओर निकल पड़े। वहां उन्होंने मिलेंडर की सेना पर भयावह आक्रमण किया। मिलेंडर अपनी सेना छोड़ के भाग गया। शुंग की सेना ने उसका सिंधु नदी के पार तक पीछा किया। यहीं से सदियों से शांति की धुन में जी रही मगध की सेना को नया जोश मिला। उधर पुष्यमित्र शुंग के पुत्र अग्निमित्र शुंग ने दूसरी सेना की कमान संभालते हुए दक्षिण के राजा यज्ञसेन पर हमला कर दिया। ओर मध्य में विदिशा समेत दक्षिण के आधिपति बनकर चारो तरफ वैदिक धर्म का ध्वज बुलंद कर दिया। यहीं से वैदिक मंत्रोपचारणों की मधुर ध्वनि पुनः सम्पूर्ण भारत में गूंजने लगी। हिंदू मंदिरों का पुनः जीर्णोद्धार करवाया गया। एक बहुत बड़े भूभाग पर एकक्षत्र राज करते हुए पुष्यमित्र शुंग ने फिर से वैदिक सनातन धर्म का विस्तार किया। लगातार जीतों के बाद समाप्ति की ओर जाते हुए वैदिक धर्म को पुनः जीवित करने का कार्य किया। वर्षों से लाखो बौद्ध बन चुके हिंदुओ के पुनः वैदिक हिंदू धर्म में लगा गया। कुछ इतिहासकारों की माने तो शुंग ने मौर्य शासनकाल में हिंदू मंदिरों से बने 84000 बौद्ध मठों को पुनः हिंदू मंदिर बनाया। पुष्यमित्र शुंग ने अपने शासन काल में तीन बार अश्वमेध यज्ञ करवाकर स्वयं को आर्यावर्त का सम्राट घोषित कर दिया। अपने 36 वर्षों के शासन काल में पुष्यमित्र शुंग ने पूरे भारतवर्ष में सनातन वैदिक धर्म को पुनः फैलाया। ओर एक समय सम्पूर्ण बौद्ध बन चुके भारत को पुनः सनातन वैदिक भारत बनाया।

इतिहासकारों को नजर में –

कुछ इतिहासकारों के अनुसार बौद्ध के द्वारा डिमेट्रीयस की सेना का साथ देकर मगध साम्राज्य से धोखा करने के कारण पुष्यमित्र शुंग ने बौद्ध भिक्षुओं को अपने राज्य में शरण देना बंद कर दिया

वहीं कुछ इतिहासकार लिखते हैं पुष्यमित्र शुंग बौद्ध के शत्रु नहीं थे । बल्कि उन्होंने सुस्त पड़ चुकी भारतीय व्यवस्था को पुनः गौरव दिलाया था। उनके राज्य में बौद्ध सुरक्षित रहते थे और अपने धर्म का स्वतंत्र रूप से पालन करते थे। बौद्धों पर किसी भी प्रकार का धर्म परिवर्तन का दवाब नही बनाया गया

शुंग साम्राज्य में बौद्धों को समान अधिकार प्राप्त थे, बौद्धों का कभी दमन नही हुआ, वे एक सम्मानित नागरिक थे ।

“आज हमारा समाज महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग का सदा ऋणी रहेगा । भारत भूमि धन्य थी जिसने पुष्यमित्र शुंग जैसे महावीरों को जन्मा जिन्होंने पुनः भारतवर्ष के गौरवशाली वैदिक धर्म को स्थापित किया। “

– अनिरुद्ध कुमार

Pushyamitra Shunga / पुष्यमित्र शुंग कौन थे ?

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